#2 रिश्तों की डोर

MSP OFFICIAL #2



              

  " परिवार उस रस्सी की तरह होता है , जिसे तभी तक पकड़ा जा सकता है जब तक  उसमे कोई गाँठ न हो |"


 



                    

                      रिश्तों की डोर

  हर कदम ,हर पल ,जिंदगी के हर मोड़ पर हमसे जुड़ता है एक नया रिश्ता |पर न जाने क्यों हम उसकी कद़र नहीं करते ? क्यों हम उसे एक सहारा नही बल्कि एक बोझ मानते हैं ? जो पिता अपनी हर खुशी ,हर सपने को हमारी खुशी ,हमारे सपने के लिए मार देता है ,क्या वो रिश्ता एक बोझ हो सकता है ? 
         " जब संसार से हार कर तू पूरी तरह से टूट जाता है तो गिरते हुए तुझको जो थाम लेती है वो है...रिश्तों की डोर |"

         " अपने आप को उड़ती पतंग मानने वाले इंसान जरा सोच कि , रिश्तों की डोर से कट कर तू कहाँ उड़ पाएगा |"

                                           मधुसूदन पंचारिया

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